तु -Poem
क्यू सोचे जो तु पा लिया तो सेवेरा जो चला गया वो ना था कभी तेरा जो टूट गया वो ना था तेरा बसेरा फिर क्यू सोचे तु जो गिरगया तो अंधेरा ।।vg हर जो वो सूरज निकले दिन नया जो आये हो रात चांदनी तब तु खुद को हि तो पाये अंतर्मन को ढूंढ के जो तु अंततकल तक जाये हर चीज़ मिले जो तूने सपनो थे बनाये।। तु क्यू समझ ना पाये इसक होवे सच्चा वो हक ना जताये वो देख तेरी चेहरे की लाली कुछ भी कर जाये वो दाग़ मिटाये जो जग ने तुझपे है लगाए ।। ढूंढ रहा है जो तु जग मे झाक् दफा एक अपने मन मे है पाख परिंदा तु अपने दर के चल उरजा लेके ख्वाब सिखर के ।। तु देख आसमान को फलक तक पोहच जायगा जो है तेरा बस वो तेरे संग हि रह जायगा है क्या कला और क्या बला जो तुझको झुकायेगा तु बस कर्म कर तेरा कर्म हि है जो संग तेरे जायगा ।








